Monday, September 3, 2012

किशन कारीगर - आब मानि जाउ ने (हास्य रेडियो नाटक)


 परिचय पात:-
 राजेश- नायक।
कमला- नायिका-राजेशक पत्नी उर्फ पाहीवाली।
मनोहर- राजेशक लंगोटिया दोस्त।
विमला- मनोहरक पत्नी उर्फ ठाढ़ीवाली।
नीलू- विमलाक सहेली।
सोनी- नीलूक सहेली।
मदन- दोस्त। 
       
प्रथम दृश्य                        
               ध्वनि संगीत
कमलाः- (कनेक तमसाएल भावमे) मारे मुह धऽ, आब बाट तकैत-तकैत मोन अकछा गेल। हिनका किछु अनबाक लेल नै कहलियैन कि एकटा आफद मोल ल लेलौं

तखने राजेशक प्रवेश
राजेश:- (दारूक निशामे बड़ाइत) हे यै पाहीवाली, कतए छी यै, एम्हर आउ ने यै पाहीवाली।
कमला:- (खूम खिसियाएल भावमे) लगैत अछि जेना पूरा अन्धरा बजारे खरीदने आबि रहल छथि। त द्वारे अन्हराएल छथि।
राजेशः- हे यै पाहीवाली,हाँ जुनी खिसियाउ एकबेर हमर गप सुनू ने।
कमलाः- हम की खाक सुनूहाँकेहमर कोनो फिकिरे नै रहैए।
राजेशः- (निशामे मातल गबैत अछि)  भिजल ठोर अहाँक।
कमलाः- हे दैब रौ दैब,हाँक एहेन अवस्था देखि त हमर ठोर मुह सुखा गेल आ अहाँ कहै छी जे भिजल अछि।
राजेशः-हाँ फुसियाहीक खउजा रहल छी, गीत सुनू ने। प्यासल दिल ल..ल हमर।
कमलाः-( खउजा क)  हे भगवान, एतेक पीबलाक बादो अहाँके पियास लगले अछि, हैए लिअ, घैला महक ठंढा पानि।
राजेशः- (हँसैत बड़ाइत अछि) अहूँ कमाले क रहल छी पहिने गीत सुनि लि ने।
राजेशः- कियो हमरा संगे भिनसर तक रहतै तकरा हम करबै खूम प्यार ओ...हो...ओ हो...हो...ओ..हो...हो।
कमलाः- आब कि खाक प्यार करब। आब एक पहर बाद भिसरो भ जेतै।
राजेशः- (गीत गबैत गबैत सुतबाक प्रयास) आ सिटी बजा रहल अछि।
कमला:- हे महादेव, एहेन गबैयाके नींद द दिऔ।
राजेशः- आब हए हम नानी गाम गेलौं, आ अहाँ अपना गामस जलखै नेने आउ।
कमला:- अच्छा आब बुझनूक बच्चा जका चुपेचाप कले-बले सूति रहू ने।
राजेश:- ठीक छै पाहीवाली,अहॉं कहै छी त हम सूति रहै छी, मुदा जलखै बेरमे हमरा उठा देब।
राजेश सूति रहैत अछि।
 दृश्य समाप्त 
              दृश्य- 
चिड़ै चुनमुनक चूं...चूं क ध्वनि
कमला:- (राजेशके उठबैत) हे यै, आब उठि जाउ ने भिसर भ गेलैए।
राजेश:- पाहीवाली, अहॉं ठीके कहै छी की?
कमला:- ठीके नै की झूठ कनेक अपने आँखिसँ देखू, भिसर भऽ गेलै।
राजेशः-यै, ठीकेमे भिसर भऽ गेलैए अच्छा त आब हम मॉर्निंग वॉक माने घूमि-फिरि कऽ अबै छी।
कमला:- अच्छा ठीक छै, जाउ मुदा जल्दीए घूमि लि आएब। ताबैत हम चाह बना क रखने रहै छी।
राजेशः- बेस तआब हम घुमने अबैत छी। ओ. के. बा-बा
राजेशक घरसँ प्रस्थान।
 पार्कमे बातचीत करबाक ध्वनि प्रभाव।

मनोहर:- (दौगि रहल अछि आ हाँफी लैत) भाइ, काल्हि राजेश लंगोटिया देखबामे नै आबि रहल अछि।
मदन:- (खैनी चुनेबाक पटपट)  से तठीकेमे भाइ। ई हमरा तँ बुझना जाइए जे ओ तसासुरमे मंगनीक तरूआ तोड़ि रहल अछि।
मनोहर:- से जे करैत हुए मुदा भेंट तकरबाक चाही
मदन:- (हरबड़ाइत)  ए.... ई लिअ, नाम लैत देरी राजेश सेहो आबिए गेल।
दौगल अबैत राजेशक प्रवेश।
मनोहर:- (राजेशके देखैत) ओ-हो हमर दोस, की हाल चाल छौ।
राजेशः- हम तठीके छी भाइ, तू अपन कह, की समाचार।
मदन:- राम राम, यौ लंगोटिया भा
राजेशः- (हसैत) आहा हा हा, राम राम यौ चिकनौटिया भा
मदन:- राजेशक हाल त हमरासँ पूछू बेचारा चिन्तासनठी जकॉं सुखा गेल।
राजेश:- की भेलैए एकरा से कहब ने, कोनो दुख तकलीफ आफद विपैत।
मदन:- (राजेशसँ) हमरासँ नीक जे राजेश भा  अपने कहिए दहक, तखन हो बकलेल छौड़ा बूझिए जेतै।
मनोहर:- (उदास भऽ क) भाइ, की कहियौ, जहियासँ ठाढ़ीवाली रूसि क अपना नैहर चलि गेलैए, हमरा त एक्को कनमा निक्के नै लगैत अछि।
राजेश:- किए, तू भौजीके मनेलही नै?
मनोहर:- रौ भाइ, कतबो मनेलिमुदा ओ नै मानलकै।

राजेशः- से किए? एहेन की भऽ गेलैए जे भौजी मुफुलौने ठाढ़ी चलि गेलौ।
मनोहरः- हमरा दारू पीबाक हिसक छल, द्वारे हमर ठाढ़ीवाली सपत देलक मुदा हमर हिसक छूटल नै
राजेशः- (किछु सोचैत) हमरो पाहीवाली हमरास रूसल रहैत अछि किएक त ओकर फरमाश जे पूरा नै केलि
मदनः- (खैनी चुनेबाक पटपट अवाज) हें हें, हा हा, हम त कहै छी, दुनू गोटे अपना-अपना कनियाँके मना लिअ आ झगड़े खतम।
मनोहरः-हाँ ठीके कहलौं मदन भा। आब हम अपना ठाढ़ीवालीके मनाएब।
मदन:- हर हर महादेव,झटसनिकालू हमर सवा रूपैया दक्षिणा।
मनोहरः- ओकरा सामने सपत खाएब जे आब हम दारूके मुनै लगाएब।
राजेशः- देरी किए? चल ने, ठाढ़ीवाली भउजीके मनेबाक लेल अंधरा-ठाढ़ी चलै छी।
मनोहरः- ठीके रौ भाइ, चल। मुदा जाइस पहिने तू अपना पाहीवालीके फोन कऽ दही ने।
राजेश:- तू ठीके कहि रहल छें, हम एखने फोन लगबै छी।
मोबाइलसफोन लगेबाक ध्वनि प्रभाव
स्वर:- महिलाक अवा हेल्लो ।
राजेश:- हम आ घर नै आएब। किए तहम मनोहर संगे ओकर सासुर जा रहल छी।
स्वरः- अहॉंके एक्को राति हमर फरमाश मोन नै रहैए।
राजेशः- पाहीवाली,हाँ जुनि रूसी, हम अहाँ लेल किछु ने किछु नेने आएब।
स्वर:- ठीक छै त जाउ, मुदा जल्दीए चलि आएब। बा-बा
राजेशः- बेस, बा-बा
फोन कटबाक ध्वनि
राजेशः- पाहीवाली त मानि गेलैए, चल आब ठाढ़ीवालीके मनबैत छी।
मनोहरः- हाँफैत हॅं हँ, किए नै? जल्दी दौगल चल।
मदनः- भाइ, हमर द द दक्षिणा।
सैत हसैत मनोहर आ राजेशक प्रस्थान।
मदन:- (हसि क) ई दूनू गोटे त सासुर चलि गेल, आब हमहू जाइ छी बाबूबरही, अपना पंडिताइनक भेट कबी, हें हें हें।
       
             दृश्य-
लड़कीक जोरससबाक अवा
(नीलू आ सोनी दूनू गोटे गीत गाबि हसी मजाक करैमे लागल अछि)
नीलूः- गीत गबैत आबि जाउ, एके बेर आबि जाउ।
सोनीः- केकरा बजा रहल छीही गे, आ आ आबि जाउ।
नीलू-( मुस्की मारैत) केकरो नै, तोरा ओझाके
सोनी:-(गीत गबैत) तहीं ने, सोहा आबि जाउ, एक बेर आबि जाउ।
ताबे मनोहर आ राजेशक प्रवेश।
नीलूः- दुनू गोटेके देखि कऽ दुल्हा बाबू, आबि जाउ, एक बेर आबि जाउ।
मनोहर:-हाँ बजेलौं आ हम हाजिर। कहू समाचार।
सोनीः- ठीके मे गै बहिना, देखही गे, एहेन धरफड़िया दुल्हा देखल नै
नीलूः- प्रणाम यौ पाहुन। रस्ता मे कोनो दिक्कस त नै भेल ने?
मनोहरः- दिक्कस कि खरंजा आ टुटलाहा पिच पर साइकिल चलबैत काल हार पाजर एक भऽ गेल।
सोनी:- आब मजा आबि रहल अछि।
राजेशः- मजा तआबि रहल अछि मुदा हमरा भौजीसभेट करा दितौं ठीक्के मे मजा आबि जतए।
नीलू:- अहॉंकेँ नै चिन्हलौं यौ हरबड़िया पाहुन।
राजेशः- सि क हा हा हा, हमरा नै चिन्हलौं, हम अहाँक पाहुनक लंगोटिया दोस राजेश छी।
(सभ गोटे ठहक्का लगबैत)
सोनीः- अहॉं कतेक नीक बजैत छी। चलू ने घुमए लेल।
नीलूः- यौ पाहुन, चलू चलू गाछी कलम आ खेत पथार सभ देखने अबैत छी।
राजेशः-ँ हँ, किए नै, चलू ने तीनू गोटे घुमने अबै छी।
ठहक्का लगबैत तीनू गोटेक प्रस्थान।
मनोहर:- वाह रे किस्मत। सासुर हमर मुदा मान-दान एक्कर। हा रे किस्मतक खेल।
तखन गीत गबैत विमलाक प्रवेश।

(गीतक ध्वनि- पिया परदेशस पजेब नेने ब यौ पिया)
विमलाः- आश्चर्य भावस अ अ अहॉं।
मनोहरः- हँ,हाँ बजेलौं आ हम हाजिर छी। कहू कुशल समाचार।
विमलाः- (रूसि क बजैत) अहॉं के बजेलक के? जाउ हम अहाँँ नै बाजब।
मनोहरः- अहूॅं त कमाले करैत छी। देखू तँ, हम अहाँक लेल की सभ अनने छी।
विमलाः- (आश्चर्य भावस) क क की अनने छी हमरा लेल??
मनोहरः- (प्यारस) ट...ट...ट टॉफी।
विमला:-हाँकेँ टॉफी छोड़ि आरो किछु बजारमे नै भेटल की?
मनोहरः- जिलेबी सिंहारा तकिनने छलौं अहींक लेल मुदा रस्तेमे भूख लागि गेल त अपने खा लेलौं
विमलाः- (उदास भऽ क) अहॉंके एक्को राति हमर चिन्ते नै रहैए।
मनोहरः- चिंता रहैए, द्वारे तआब हम दारू पिअब छोड़ि देलौं
विमलाः- (अकचका क) ठीके मे?
मनोहरः-ँ, हम सपत खेने छी कि आब हम दारू कहियो ने पिअब।
विमलाः- ई त बड्ड नीक गप। आब हम किछु फरमाश करी त?
मनोहरः- (हसैत) अहॉं फरमाश त करू, हम पूरा अंधरा बजारे घर उठौने चलि आएब।
तखने नीलू, सोनी आ राजेशक प्रवेश।
नीलू:- दीदी-दीदी चल ने, पाहुन संगे बजार घुमने अबै छी।
मनोहरः- हँ, चलू-चलू देरी जाएत आइ, अहॉं सभके अंधरा बजार घुमा दै छी।       
ठहक्का लगबैत सहक प्रस्थान।
                      
दृश्य-
बजारक दृश्य, बिक्रेता सभक विभिन्न अवा
बिक्रेताः- घड़ी लऽ लिअ, रेडियो लऽ लिअ।
बिक्रेता:- (डुडुगी बजबैत) हे धिया-पुता लेल डुडुगी ल लिअ, डूग-डूग।
राजेशः- भाइ, हमरा एकटा रेडियो किनबाक रहै।
बिक्रेताः-ए लिअ ने, ऐठाम भेटत कम दाममे नीक रेडियो।
मनोहरः- लगैए तोहर दिमाग कतौ हरा गेलौ। घरमे टी.वी. छौ तइओ?
राजेशः- (अफसोस करैत) तोरा केना कहियौ कि..
विमलाः- कहू तँ, सी.डी., टी.वी.क युगमे कहू तकियो आब रेडियो किनतै?
राजेशः- (हसि क) हमरा पाही वाली के पसीन छै द्वारे तँ कीनि रहल छि
मनोहर:- तखन त एखने खरीद ले।
राजेशः- हे भाइ, एकटा बढ़िया क्वालिटीक रेडियो दिह
बिक्रेताः- ई लिअ भा साहेब।
राजेश:- ह, ई लिअ पा
पा देबाक ध्वनि प्रभाव।
मनोहर:- तचल, आब चलैत छी अपना गाम तोरा पाहीवालीके मनेबाक लेल।
नीलूः- यौ पाहुन, आ हम सभ?
राजेश:- अहूँ सभ चलू ने, हमर गाम घर देखि क आपिस चलि आएब।
सोनीः- नै यौ पाहुन, पहिने हमरा सभके घर तक छोड़ि दिअ। फेर कहियो अहाँक गाम मेला देखै लेल हम दुनू बहिन आएब।
मनोहरः- ठीक छै त चलू,हाँ सभके गामपर द अबै छी, तकरा बाद हम सभ अपना गाम चल जाएब।
विमला:- ई भेल ने बुझनुक मनुक्खला गप।
ठहक्का लगबैत सहक प्रस्थान।

 दृश्य-
भनसा घरक दृश्य। कमला गीत गुनगुना रहल अछि। तखने राजेश, मनोहर विमलाक प्रवेश।
राजेश:- सुनू ने, सुनू ने, सुनि लिअ नेहमर पाहीवाली सुनू ..ने।
कमला:- हमरा अहाँक कोनो गप नै सुनबाक अछि।
राजेशः- हे यै, जुनि रूसू, सुनू ने.....सुनू ने।
कमला:- कहलौं ँ, नै सुनैत छि
राजेशः- अहींके सुनेबाक लेल त बजारसअनलौं। देख त लिअ।
कमला:- (खिसिया क)  हम कि कोनो अहॉं काहीर छी??
राजेश:- (अफसोस करैत) पाहीवालीके हम केना बुझेबै जे कोनो फरमाश केने रहै।
विमला आओर मनोहर एक दोसरस कनफुसकी कऽ गप करैत।
मनोहर- (विमलासँ) लगैए कमलाके किछु बुझेबाक चाही
विमला- कमला बहिन एतेक खिसियाएल किए छी? हमरा तहि सकै छी।
कमला- हिनका की कहियनि बहिन। पहिल सालगीरहक दिन हिनकास किछु फरमाश केने रहियनि मुदा हिनका तकोनो धियाने नै रहैत छनि?
विमला- कहू तँ, एतबाक लेल एहेन खिसियाएब? पहिने देखियौ त सही, ओ अहा लेल कथी अनने छथि।
कमला- कथी, हे ने अंधरा बजारक मेथी।
विमला- नै यै बहिन,हाँ एक बेर देखियौ त सही।
कमला- (आश्चर्य भावस) हे भगवान ठीके मे!
कमला- राजेशस हमरा लेल कथी अनने छी से देखाउ ने।
राजेश- हे भगवान आहाँ बचा लेलौं नै तँ...तफेरस
कमला- की भेल अहाँ के?
राजेश- (हरबड़ाइत बजैत अछि) अहाँ बैग खोलि क देखू ने, हम कथी नेने एलौं हाँ लेल स्पेशलमे।
बैग खोलबाक ध्वनि प्रभाव।
कमला- (हसि क) र...र....रेडियो। आब त हम मजासकांतिपुर एफ.एम., जनकपुर एफ.एम., दरभंगा, विविध भारती रेडियो सुनैत रहब।
राजेश-हाँक मोन जे सुनबाक अछि से सुनैत रहू मुदा आब मानि जाउ ने।
कमला- (रूसि क) रेडियो त अनलौं मुदा झुमका किए नै अनलौं?
मनोहर- हे भगवान, फेरस एकटा नबका मुसीबत, तूहीं बचबिह
राजेश- हे यै पाहीवाली, हम अहॉं लेल बरेलीला झुमका सेहो अनने छी। आब मानि जाउ ने।
सभ गोटे ठहक्का लगबैत। हसबाक ध्वनि प्रभाव।
मनोहर- वाह-भाइ, मानि गेलौं। रूसल कनियॉंके मनाएब तकियो राजेशससीखए।
सभ गोटे एक संगे ठहक्का लगबैत हा...हा...।

नाटक बेटीक अपमानपर एक नजरि (दुर्गानन्‍द मण्डल )


दुर्गानन्द  मण्डल

नाटक बेटीक अपमानपर एक नजरि‍
मैथि‍ली साहि‍त्यक एकटा वि‍धा नाटक अछि‍, जे वि‍धा सभ दि‍न रौदि‍याहे सन रहल। गि‍नल-चुनल नाटककारक कि‍छु नाटक जे आंगुरपर गनल जा सकैत अछि‍, दोगा-दोगी कोनो पुस्तकालयक शोभा मात्र बढ़ौलक। एकटा समए छल जइमे नाटककार जे नाटक लि‍खलनि‍ तइमे वाक्-पटुता नै रहबाक कारणे वा शुद्ध-अशुद्ध उच्चारण नै भेने वा समुचि‍त वाद-संवादक संग समदि‍याक अभाव सभ दि‍न देखल गेल। चूँकि‍ ओना हम जत्ते-जे ढकि‍ ली मुदा एकटा सत्यकेँ स्वीकार करए पड़त जे हम मैथि‍ल छी। हमरा लोकनि‍क मातृभाषा मैथि‍ली भेल। मुदा माएकेँ माँ कहैत कनेको लाज वि‍चार नै होइए। जेना कि‍ आँखि‍सँ लाजक पानि‍ खसि‍ पड़ल। तात्पर्य, मैथि‍ल होइतो दोसर भाषाक दासताक शि‍कार भेल छी आ ओकर भोग भोगि‍ रहल छी, बुझाइत अछि‍ जेना मैथि‍लीक लेल एेठामक माइटि‍ये उसाह भऽ गेल अछि‍, जइपर गदपुरनि‍ मात्र उपजि‍ सकैए। मुदा ओहेन उसाह माटि‍पर “बेटीक अपमान आ छीनरदेवी” लि‍खि‍ नाटकार बेचन ठाकुर, चनौरागंज, मधुबनी, मैथि‍ली नाट्य जगतमे एकर सफल मंचन कऽ महावीरी झंडा गाड़ि‍ समस्त मैथि‍ली, मैथि‍ल आ मि‍थि‍लाक मान-सानकेँ मात्र बढ़ेबे टा नै कलनि‍ अपि‍तु चारि‍-चाँद लगा देलनि‍। ऐ लेल ठाकुर जीकेँ समस्त मैथि‍ल भाषी आ नाट्य प्रेमीक तरफसँ हम कोटिश: धन्यैवाद दैत अपार हर्ष महसूस कऽ रहल छी। हमरा वि‍श्वास अछि‍ जे अपने ई दुनू रचना जेकर मंचन अपने अपनहि‍ कोचि‍ंग संस्थानक छात्र-छात्रा लोकनि‍सँ करा, ई साबि‍त कऽ देलौं जे मि‍थि‍लाक माटिमे‍ अखनो ओतेक शक्ति बचल अछि‍ जइपर केसरो उपजि‍ सकैत अछि‍।
नाटककारक नाटकक वि‍षय अति‍ उत्तम छन्हि। वर्त्तमान शताब्दीक सभ मनुख ऐ बातसँ भि‍ज्ञ अछि‍, सरकारी सर्वेक्षणसँ सेहो स्पष्टकत अछि‍ जे दि‍नानुदि‍न लि‍ंगानुपात बढ़ि‍ रहल अछि‍। सभ राज्यक अनुपात थोड़े ऊपर-नीचाँ भऽ सकैए मुदा कि‍यो ऐ बातसँ मुँह नै मोड़ि‍ सकै छथि‍ जे प्रति‍ हजार लड़ि‍का-लड़ि‍कीक बीच एकटा बड़का खाधि‍ बढ़ैत जा रहल अछि,‍ जइ खाधि‍मे लड़ि‍कीक अनुपात नि‍रंतर नीचाँ मुँहेँ गि‍ड़ैत जा रहल अछि‍ आ हमरा लोकनि‍ कानमे तूर-तेल दऽ नि‍चेनसँ सूतल छी। जौं ई क्रम जारी रहल तँ आगू की हएत से तँ सोचू!! ई एकटा प्रश्नवाचक चि‍न्ह छोड़बामे नाटककार एकदम सफल रहला अछि‍। एतबे नै, आजुक वैज्ञानि‍क युगमे यंत्रादि‍क सहायतासँ ई जानि‍ जे माइक गर्भमे पलैत बच्चाक, बेटा नै बेटी छी.... ि‍नर्मम हत्याई करबामे कनि‍क्को कलेजा नै कँपैए!! जेकर कोनो कसूर नै ओकरा कुट्टी-कुट्टी काटि‍ खुने-खुनामे कऽ माइक गर्भसँ बहार कऽ दै छि‍ऐ। जइ बेथे ओइ बच्चाक माए पनरह दि‍न धरि‍ बि‍छौन धेने रहैत अछि‍। ऐठाम एकटा गप हम फरिछा कऽ कहि‍ दि‍अ चाहै छी, ओ बेथा हुनकर ओइ बेटीक प्रति‍ये नै जेकर ओ हत्या करौलनि‍ अछि,‍ अपि‍तु शारीरि‍क बेथा छन्हि जइ लेल एत्ते आ एहेन कुकर्म करै छथि‍। ओइ ि‍नर्दोष बच्चाक माए-बाप दुनू ततबाए दोषी छथि‍। ओ ई नै बूझि‍ रहल छथि‍ जे जइ बेटीक ओ हत्याए करौलनि‍ जौं ओ बेटी आइ नै रहैत तँ की अपने रहि‍तौं? जौं बेटी नै हएत तँ सृष्टिक रचना संभव अछि‍? जौं हँ तँ केना वा नै तँ एहेन अपराध कऽ स्वयं कि‍एक एतेक पैघ हत्यारा साबि‍त भऽ रहल छी। रानी झांसी, लक्ष्मीबाई, सावि‍त्री, अहि‍ल्या, सती अनुसुइया, इन्दि‍रा गांधी, मैडम क्यूरी, मदर टेरेसा..., ईहो सभ तँ बेटी‍ये छलीह। जौं हि‍नको हत्या पूर्वहि‍मे कऽ देल गेल रहैत तँ आइ.....। तखन आँखि‍ रहैत एना हम सभ आन्हर कि‍एक? बुइध‍ रहैत मुर्खाहा जकाँ काज कि‍ए करै छी?
मनुक्ख तँ मनुक्ख छी ने, छागर-पाठी आकि‍ गाए-महि‍ंस तँ नै जे कतौ कोनो.....। तहूमे साढ़े-पारा अधि‍क भऽ जाए, गाए-महि‍ंस कम, तखन की हएत? जौं हम-अहाँ ई नै सोचबै तँ के सोचताह? ऐ हत्याक पाछाँ एकटा अओर कारण अछि‍ जेकर नाओं थि‍क दहेज। मुदा उहो तँ हमहीं अहाँ लेबाल आ देबालो छि‍ऐ। अखनो समाजमे आ प्राय: गाम पाछाँ एक-आध गोटे जरूर छथि‍ जे अपन बालकक बि‍आह एकटा नीक कुल-कनि‍याँ ताकि‍ आदर्श बि‍अाह कऽ उदाहरण बनै छथि‍। ऐ काजक दोषीकेँ सजा नै दऽ ि‍नर्दोषकेँ जानेसँ मारि‍ दुनू परानी ऐ पापक भागीदारी छी। छीह.......।

शास्त्रो एकटा बात बतबैत अछि‍ जे “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता।” मुदा ओकर पूजा की करबै, ओइ देवीक संसारमे एबाक अधि‍कारे छीनि‍ होइए, जे बड़का काज केलौं।
जतए समस्त वि‍श्व ऐ समस्यासँ जरि‍‍ रहल अछि‍ ओतए नाटककार अपना नाटकक माध्यमे एकटा साधारणो लेखक सदृश अपन लेखनीक माध्यमे समाजमे ई संदेश देबामे पूर्णत: सफल छथि‍ जे समए रहैत जौं नै चेतब तँ नाटकक मुख्य पात्र दीपक सदृश हाल हएत। जे अंतमे कनि‍याँक मुइला पछाति‍ अपनेसँ भात पसाबथि‍, कि‍एक तँ हुनक कनि‍याँ बरोबरि‍ गर्भपात करेबाक कारणे शोनि‍तक कमीसँ उड़ीस भऽ मुइलीह। एतबे नै, बेटीक अभावमे नगद गीनि‍ आ तखन पुतोहु घर अनलाह। तखन हुनका कबीर साहैबक ई पाँति‍ मोन पड़ैत छन्हि, “सन्तोक सभ दि‍न होत एक समाना।” आबो जौं नै चेतब तँ अहि‍ना टाका दऽ बेटी बेसाहऽ पड़त। नि‍रंतर चीज-बौस जकाँ बेटि‍योक दाम बढ़ैत जाएत, जेकरा कि‍नैत-कि‍नैत अहाँक प्राण नि‍कलि‍ जाएत। कि‍एक तँ अपना समाजमे एकटा नै कएक टा मरूकि‍याबला अखनो जीवि‍ेते अछि, जे चारि‍ लाख एकावन हजार टाका नगद आ सभ सरंजाम संगहि‍ बरि‍आती ऊपरसँ। चेतु हे मैथि‍ल आबो चेतु। नै तँ आब ओ दि‍न दूर नै जे गाड़ीपर नाव रहत। आब बेटी अपन अपमान बरदास नै कऽ सकैए।
ऐ प्रकारे नाटककार समाजक लेल एकटा पैघ संदेश दऽ रहल छथि‍ जे गर्भपातसँ पैघ कोनो पाप नै होइत अछि‍। तँए ऐ पापसँ बची आ बेटीक बाप बनी। अहुना बेटा आ बेटी दुनू कोइखि‍क श्रृंगार होइए। ऐ तरहेँ श्री बेचन ठाकुर जी हमरा लोकनि‍क नीन तोड़ैमे सफल रहला। जे श्री जगदीश प्रसाद मण्डल जीक प्रेरणापूर्ण आदर्शवादी व्यक्तिक हाथ हुनका माथपर छन्हि, हम सेहो बि‍नु मंगने शुभकामना दैत छि‍यनि‍, रहबनि‍, जे अहि‍ना नाटक लि‍खैत रहथु, मंचन करबैत रहथु। धन्यवादक पात्र श्रुति‍ प्रकाशनक श्रीमती नीतू कुमारी आ नागेन्द्र झाजी केँ जे प्रकाशनक समस्त भार उठा कृतज्ञ हेबाक मौका देलखि‍न। जौं वि‍देह प्रथम पाक्षि‍क ई-पत्रि‍काक सह सम्पादक उमेश मण्डल एवं सम्पादक गजेन्द्र बाबूकेँ, जि‍नक अथक सहयोगक प्रसादे प्रकाशनक रास्ता सुगम आ प्रकाशन सफल भेल, तँए नै लि‍खब-कहब तँ अनुचि‍त।

मुन्नी कामत -अंधविश्वास




प्रथम दृश्य
(मंचपर चौकीपर शंकर सुतल अछि, गंगाक प्रवेश।)
गंगा- बउआ-बउआ, सुतल छहक की, देखहक बाबू दरबाजा पर बजबै छऽ।
शंकर- कि, आ..हू हू हू…।
गंगा- कि भेलऽ? एना किए कराहै छहक। माय गे, माय हो, देेह तँ झरकैत छह। बउआ आँखि खोलऽ, (रूदन स्वरमे) हयौ सुनै छिऐ, दौड़ू यौ, देखियौ बउआ कऽ कि भेल। यौ, आँखि ताँखि उलटेने छै यौ, जल्दी आउ ने।
(रामाक धोती सम्हारैत आंगनमे प्रवेश)
रामा- एना चिकरनाइ भोकरनाइसँ काम नै चलत। जाउ दौ कऽ गोसाईं घरसँ गंगाजल नेने आउ।
(गंगा दौड कऽ जाइत अछि आ गंगाजलक डिब्बा नेने अबैत अछि आ कनैत-कनैत कहैत अछि।)
गंगा- हे काली माइ, हमरा कोइखक लाज राखब। हमर लालकेँ ठीक कइर दिअ। हम सहि कऽ साझ देब।
रामा- पहिले गंगाजल लाउ ने तब कोबला-पाती करैत रहब। (रामा अपन पत्नीकेँ हाथसँ झटैक कऽ गंगाजलक डिब्बा छीन लैत अछि आ शंंकरक उपर गंगाजल छीट हुनकर मुॅंह वएह जलसँ धोइ दैत अछि।)
रामा- बउआ उठऽ, केना लगै छऽ आब।
शंंकर- बाबूजी, हमर माथा दर्दसँ फाटल जाइत अछि आ जाड़ सेहो होइत अछि।
रामा- अच्छा लए, ई कम्बल ओढ़ि कऽ सुइत रहऽ, कनिकबे कालमे सभ ठीक भऽ जेतऽ। यै सुनै छिऐ शंकरक माय।
गंगा- कि कहै छिऐ?
रामा- बउआक माथपर पीरी परहक भभूत लगाउ आ अकरा अराम करऽ दियौ।

                       पटाक्षेप

                  दोसर दृश्य
(पति-पत्नी अपन कक्षमे बेटाक हालत पर विचार विमर्श करैत।)
गंगा- की भेल, किए अहाँ काल्हिसँ चुप छिऐ? की कोनो अभास भऽ रहल अछि? कहू ने, के भइडाही केने छइ। एक बेर अहाँ नाम कहि दिअ, अखने झोटा पकड़ि पोटा निकालि देबै आ घिसियाबैत पूरा गाम ओंघरेबै। सँइखोउकी बेटखोइकी सभ ककरो नीक देखै लेल नै चाहै छइ।
रामा- (जोरसँ) बन्द करु अपन सत्यनरायलनक कथा। ई ककरो केलहा नै अपने घरक गोसाँइ अछि। आइ तक ककरो एहेन बोखार देखने रहिऐ। अपन देहमे अतेक आगि देविये रखैत अछि। जरूर हमरासँ कोनो गलती भेल जे हमरा पर मइया तमसा गेलखिन। हमरा हिनका शांत करै लेल गुहार लगबइये पड़त।
गंगा- अहाँ तँ अपने भगत छी। कौल्हका दिन निक अछि, काल्हिये बैसकी बैठाउ। हम जाइ छी, पूजाक सामग्री जुटबै लेल।
(गंगाक प्रस्थान होइत अछि आ रामा गम्भीर सोचमे डुबल रहैत अछि।)

                               पटाक्षेप

                   

तेसर दृश्य

(एगो दौरामे पूजा सामग्री एकट्ठा करि गंगा आ शंंकरक आगमन, हुनके पाछू दू-चाइर लोकनी सेहो अबैत अछि।)
गंगा- बउआ बाबू आबै छऽ, ताबे तूँ पूजा करऽ। ई फूल अक्षत चढ़ा कऽ धूप देखबऽ।
शंकर- (फूल जल चबैत कहैत छथि) आब की करब?
गंगा- अतऽ कल जोइड़ बैठू।
(रामाक संगे चारि लोग जे ढोल आ झाइल लेन अछि, हुनकर प्रवेश।)
रामा- शंकरक माय, सभ तैयारी कऽ लेलौं? गंगाजल संगेमे राखने रहब।
(रामा गोसाँइ निपैत अछि आ फूल अक्षत चढ़ा कऽ माँक प्रार्थना करऽ लगैत अछि। चारू लोकनी डाला बिचमे रखैत माँक गुहार लगबैत अछि आ ढोल झाइल सेहो बजबैत अछि।)
चारू लोकनी- तोहरे दुआरे मइया हम
          अर्जी लगैलियइ हेऽऽऽऽऽऽऽऽऽ हूंऽऽऽऽऽऽऽ
          बोल जय गंगे,
          बोल जय गंगे,
          बोल जय गंगे।
   बोल की कष्ट छउ, किए बजेलऽ हमरा, बोल, बोल, की भेलउ?

गंगा- हे मइया, की गलती भेल हमरासँ आ हमरा घरलासँ। सभ दिन तँ अहींक पिरी निपैत आँखि खुलैत यऽ हमर, कि अपराध भेल जे हमरा बेटाकेँ अहाँ चारि दिनसँ मतेने छी।
रामा- अहिना भूइज कऽ खेबउ। अपना खाय छऽ छप्पन प्रकार आ हमरा लऽ फूल अक्षत। एक दिशसँ सभकेँ भूइज-भूइज खेबउ।
गंगा- एना किए कहै छऽ, अगर हमरासँ कोनो कुघटी भेल तँ हमरा माफ कइर दिअ, अहाँ जे कहब हम सभ करै लेल राजी छी।
रामा- तँ ठीक छइ, हमरा जानक बदले जान चाही। हमरा हर अमावश्याक राइतमे इकरंगा खस्सीक बैल देबही तँ तोहर कल्याण भऽ जेतउ। ले ले, लेह अक्षत, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे।
गंगा- अहिना हएत भगवान, हम जानक बदले जान देब।
रामा- होऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ हएऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ बोल जय गंगा, बोल बोल जय गंगे, बोल बोल जय गंगे। आब हम चलै छी।

                         पटाक्षेप
चारिम दृश्य
(ग्रामीणक बीचमे)
गंगा- हयोउ, जब घरक देवता बैल मांगै छइ तँ अहाँकेँ दइमे कि हिचकिचाहट भऽ रहल अछि। बउआ दिश देखियौ तँ, आइ पॉंच दिन भेल, बेदरा एक बेर नै आँखि खोलइ यऽ।
रामा- आब अपन गहबरमे बैल नै पड़ैत अछि, हमर बाबा अपन अंगोरिया आंगुर चिर कऽ बैल सौपने रहथि, ओही कऽ बदले लरू चबैत रहथि। केना फेरोसँ बैल दी वएह सोचै छी।
गंगा- अहाँकेँ बेटाक चिंंता नै अछि? हम बैल देबै, हम वचन देने छी।
एगो ग्रामीण- हो रामा, किए अतेक सोचै छऽ तूँ। अपना मने तँ नइ दै छऽ। माँ मांगलकऽ। जाधरि तूँ बैल नइ देबहक शंंकर ठीक नइ हेतऽ। बेटा लऽ दऽ दहक।
गंगा- सुगनी लग एक रंगा खस्सी छइ। लऽ आनू गऽ। हम कहने रहि तँ कहलकै, लऽ जाउ।
                    पटाक्षेप

                  अंतिम दृश्य 
(ग्रामीणक भीड़क बीच बेहोस अवस्थामे शंंकर।)
गीत- काली मइया हे कनिये, काली मइया हे कनिये
    होइयो न सहायऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ
रघुनाथ- हयोउ, कि बात छिऐ। यौ रामा, कक्काक अइठाम अतेक भीड़ कथी कऽ छिऐ।
एगो ग्रामीण- हुनका बेटा कऽ देहमे काली समैल छइ, कहै छइ कि जानक बदले जान नइ देबही तँ अकरा भूइज कअ खेबउ। अखन वएह बइल दैत अछि, ओकरे भीड़ छिऐ।
रघुनाथ- कहिया तक ई अंधविश्वास रहत अ गाममे। चलू चलि कऽ देखै छी।
(रामाक घरमे रघुनाथक आगमन)
रघुनाथ- काकी, कतऽ अछि बउआ, देखू।
गंगा- रघुनाथ बउआ, आइब गेलहक सहरसँ। अए, देखहक ने आइ छऽ सात दिन भऽ गेलैए, आँखि नइ खोलै छइ। जाधरि बइल नइ देबइ, नइ छोड़थिन मइया।
(रघुनाथ शंंकरक नब्ज देखैत आ सिर पर हाथ राखि आँखि देखैत कहैत छथि।)
रघुनाथ- काकी अहाँ सभ अपन मूर्खताक कारण अकरा जानसँ माइर देबइ। अकरा दिमागी बुखार भेल अछि। अगर इलाजमे देर करबै तँ बेटा कतौ नइ मिलत।
रामा- बेसी तूँ इंगलिस नइ बतिया, ई कोनो बुखार नइ देवीक केलहा छिऐ, हमरा अपन काज करऽ द
रघुनाथ- हौ कक्का, एगो बातक जबाब तूँ सभ ग्रामीण मिल क दए। तोरा दुगो पुत्र छऽ, एगो बिमार छऽ तँ कि तूँ एगो पुत्रक जान लऽ कऽ दोसर पुत्रक जान बचेबहक, नइ ने। तँ फेर माँ काली ई कोना करथिन। हुनका लेल तँ अ संसारमे रहैबला हर जीव माँक संतान छी। फेर ओ ई कोना करथिन। अंधविश्वासक चादरमे नइ लिपटल रहऽ। जागऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ आबो तँ जागऽ।
रामा- तूँ आइ हमर आँखि खोइल देलहक। चलऽ बउआकेँ अस्पताल लऽ चली।
            जानक बदले जान देनाइ
            अछि ई अंधविश्वासक बाइन
            री परन हम सभ ई कि
            नइ लेब आब ककरो प्राण।

                     इति।