Wednesday, August 24, 2011

गजेन्द्र ठाकुरक अपाला आत्रेयी-दानवीर दधीची/ संकर्षण-नाटक- राजदेव मंडल

अपाला आत्रेयी-दानवीर दधीची/ संकर्षण-नाटक-
अपाला आत्रेयी आर दानवीर दधीची-एहि‍ दुनू बाल नाटकमे आहॉं कथा कि‍छु नव रूपे प्रकट कएने छी। से पात्रकेँ अनुरूपे अछि‍। कथोप-कथनमे प्रवाह अछि‍ आर छोट-छोट वाक्‍यक प्रयोग अछि‍। जे नाटकीयतामे प्रभाव उत्‍पन्न करैत अछि‍। जेना दानवीर दधीचि‍क एकटा कथोपकथन : ‍“दधीची- इन्‍द्र। कुरूक्षेत्र लग एकटा जलाशय अछि‍ जकर नाम अछि‍, शर्यणा। अहॉं ओतय जाउ। ओतय घोड़ाक मुड़ी राखल अछि‍.....। ओहि‍सँ नाना प्रकारक शस्‍त्र बनाउ।‍”
बाल नाटक- बालकेँ ज्ञान बृद्धि‍क लेल सेहो उपयोगी अछि‍।
संकर्षण-
नाटक एकटा नवीन चरि‍त्रसँ परि‍चि‍त करबैत अछि‍। जे गामक लोककेँ ठकनाइकेँ नीक बुझैत अछि‍। एि‍ह अवगुणकेँ प्रति‍भा बुझैत रहैत अछि‍।‍ अवगुणक प्रति‍फलपर कनेको वि‍चार नहि‍ करैत अछि‍। वएह बेकती जखन दि‍ल्‍ली सन महानगर जाइत अछि‍ तँ रास्‍तामे स्‍वगं ठका जाइत अछि‍। लालकि‍लामे जूता कि‍नबा काल ओकरा पता चलि‍ जाइत अछि‍ जे ओ ठक वि‍द्यामे कतेक पाछू अछि‍, उदाहरण रूपेँ एकटा कथोपकथन : ‍“गोनर- अहॉंकेँ ठकि‍ लेलक। अहॉंक नाम तँ बुझनुक लोकमे अबैत अछि‍। संकर्षण- मि‍त्र की कहू‍?......। एहि‍ लालकि‍लाक चोर बजारक लोक सभ तँ कतेको महोमहापाध्‍यायक बुद्धि‍केँ गरदामे मि‍ला देतन्‍हि‍।‍”
छोट छीन कथोपकथन द्वारा व्‍यंग्‍य, हंसी आ गम्‍भीर बातकेँ सहज ढंगसँ कहि‍ देब अहॉं लेखनीक वि‍शेषता थीक। नाटककेँ आकार लघु अछि‍ जे नवीनताक सूचक अछि‍। तथा मि‍थि‍लामे पसरल बहुत रास बातकेँ समटबाक प्रयास नि‍श्‍चय सराहनीय अछि‍। मंचि‍त करबाक लेल दि‍शा नि‍र्देश नीक ढँगे कएल गेल अछि‍।
नाटक पठनीयता संगे नाटकीयतासँ परि‍पूर्ण अछि‍। आर संकर्षण आकर्षणसँ भरल अछि‍।।(साभार विदेह)

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